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पहले Dada फिर Dalda, कासिम दादा ने शर्त के साथ दी नाम में L जोड़ने की इजाजत; मशहूर घी ‘डालडा’ का दिलचस्प किस्सा

नई दिल्ली। भारतीय घरों की रसोई में घी का महत्व सदियों से रहा है, लेकिन महंगा होने के चलते गरीब परिवारों और आम आदमी के किचन में शुद्ध घी (Pure Ghee) की किल्लत रहती है। इस परेशानी को देखते हुए एक समय था जब देश में वनस्पति घी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने लगा और वनस्पति घी का पर्याय बना डालडा (Dadla), यह वनस्पति घी इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे भारत में घी के विकल्प के तौर पर देखा जाता था।

गरीब परिवारों की रसोई में तो डालडा घी ने सालों तक राज किया। क्या आप जानते हैं डालडा घी, भारत कैसे आया और किसने शुरू किया इस वनस्पति घी का कारोबार…

कौन लेकर आया Dalda घी?

भारत में  को कासिम दादा (Dada) नाम के शख्स ने पेश किया था। 1930 से पहले कासिम डाडा देसी घी के सस्ते विकल्प के लिए एक डच कंपनी से वनस्पति (हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल) आयात करते थे। दरअसल, उस समय अंग्रेजी हूकुमत के दौरान देश में आर्थिक हालात इतने खराब थे कि लोगों के लिए देसी घी खरीदना आसान नहीं था और इस मजबूरी में वनस्पति घी की जरूरत महसूस की गई और इसकी कमी डालडा ने पूरी की

1930 के दशक में भारत में मिलने वाला हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल घी, कासिम दादा और हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग कंपनी द्वारा देश में आयात किया जाता था। हिंदुस्तान वनस्पति को अब हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) के नाम से जाना जाता है।

Dada से कैसे हुआ Dalda

कासिम दादा ने अपना इम्पोर्ट किया हुआ प्रोडक्ट ‘दादा (Dada) वनस्पति’ ब्रांड नाम से बेचा। इस दौरान यूनिलीवर ने महसूस किया कि देशी घी की ज़्यादा कीमत के चलते लोग उसके विकल्प के तौर पर वनस्पति घी को पसंद कर रहे हैं और यह एक मुनाफ़े वाला बाज़ार था। इसके बाद हिंदुस्तान वनस्पति ने हाइड्रोजनेटेड वेजिटेबल ऑयल का स्थानीय स्तर पर उत्पादन शुरू करने के प्रयास शुरू कर दिए।

 

Abhitab Namdeo

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