बिना फ्रिज, बिना केमिकल, सालभर स्टोर रहगा टमाटर, ये है छत्तीसगढ़ी ‘पताल खोयला’ का देसी सुपर जुगाड़

छत्तीसगढ़ में इन दिनों टमाटर की कीमतों में भारी गिरावट देखने को मिल रही है. बाजार में टमाटर मात्र 10 रुपये किलो तक बिक रहा है. ऐसे समय में ग्रामीण अंचलों की महिलाएं टमाटर को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए पारंपरिक देसी तरीके अपनाती हैं, जिसे छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘पताल खोयला’ या ‘पताल फतका’ कहा जाता है. यह विधि न केवल टमाटर को खराब होने से बचाती है, बल्कि महंगाई के समय घर की रसोई का सहारा भी बनती है.काफी लंबे समय से टमाटर को प्रिजर्व कर रखने वाली छत्तीसगढ़ की गृहणी सुलोचना नायक बताती हैं कि जब बाजार में टमाटर सस्ता होता है, तभी इसे खोयला बनाकर संग्रह किया जाता है. इसका महत्व तब और बढ़ जाता है, जब बाद में टमाटर की कीमतें आसमान छूने लगती हैं. उस समय यही पताल खोयला चटनी और सब्जी बनाने में उपयोग किया जाता है और बाजार पर निर्भरता कम हो जाती हैप्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक और बिना किसी केमिकल
पताल खोयला बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह प्राकृतिक और बिना किसी केमिकल प्रिजर्वेटिव के होती है. इसके लिए सबसे पहले ताजे और पके हुए टमाटरों को धोकर बड़े आकार की कढ़ाई में डाल दिया जाता है. फिर धीमी आंच पर टमाटरों को लगातार चलाते हुए पकाया जाता है. इस दौरान टमाटरों को पिचक-पिचक कर तब तक पकाया जाता है, जब तक उनका पूरा रस सूख न जाए और गाढ़ा पेस्ट जैसा रूप न बन जाए. यह प्रक्रिया लगभग 1 से 2 घंटे तक चलती है, जो टमाटर की मात्रा पर निर्भर करती है.इस दौरान चम्मच चलाते रहना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि अगर टमाटर कढ़ाई में चिपक जाए तो खोयला ठीक से तैयार नहीं हो पाता. पकने के बाद स्वाद अनुसार नमक मिलाया जाता है और फिर इस मिश्रण को 2 से 3 दिन तक धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है. पूरी तरह सूखने के बाद इसे प्लास्टिक या कांच के डिब्बों में सुरक्षित रख लिया जाता है.
स्वाद लगभग ताजे टमाटर जैसा बना रहता
गृहणी सुलोचना नायक का कहना है कि यदि इन डिब्बों को फ्रिज में रखा जाए तो इसका स्वाद लगभग ताजे टमाटर जैसा बना रहता है. इसे किसी भी मौसम में उपयोग किया जा सकता है. गांवों में टमाटर खोयला का इस्तेमाल मुख्य रूप से चटनी बनाने, खट्टा सब्जी तैयार करने और दाल में खट्टापन लाने के लिए किया जाता है.
आज जब महंगाई आम आदमी की रसोई पर असर डाल रही है, ऐसे में छत्तीसगढ़ की यह पारंपरिक विधि आर्थिक बचत के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा का भी मजबूत उदाहरण बन रही है. ‘पताल खोयला’ न केवल स्वाद को बनाए रखता है, बल्कि ग्रामीण जीवन की समझदारी और आत्मनिर्भरता की पहचान भी है.



