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*दीपावली के पावन पर्व पर छत्तीसगढ़ में पारंपरिक सुआ नृत्य की धूम, नन्हीं बच्चियों और महिलाओं ने बिखेरा लोक संस्कृति का रंग*

 

​बेरला:- दीपावली के नजदीक आते ही छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी अंचलों में पारंपरिक लोक संस्कृति की जीवंत छटा देखने को मिल रही है। पर्व से एक सप्ताह पूर्व ही गांवों और शहरों में नन्हीं बच्चियों और महिलाओं की टोलियां पारंपरिक छत्तीसगढ़ी वेशभूषा में सज-धजकर घर-घर सुआ नृत्य कर रही हैं, जिससे पूरा ग्रामीण अंचल पारंपरिक गीतों और इसकी थाप से गुंजायमान हो उठा है।
​नन्हीं बालिकाएं और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा के साथ टोकरी में हरे रंग के सुआ को आकर्षक ढंग से सजाकर घरों और दुकानों के आंगन में पहुंच रही हैं। “तरी नरी नहा नरी नहा नरी ना ना रे सुअना हो, कइसे के बन गे वो ह निरमोही रे सुअना…” जैसे पारंपरिक सुआ गीतों की लय पर थिरकती बालिकाओं का उत्साह देखते ही बनता है। इस नृत्य के दौरान महिलाएं गोल घेरा बनाकर तालियों की थाप पर परिक्रमा करती हैं। इन गीतों में भगवान शिव-पार्वती, गणेश, राम-सीता के प्रसंगों के साथ ग्राम देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है, जिससे परिवार और समाज की सुख-समृद्धि व खुशहाली की कामना होती है।
​बेरला नगर सहित मनियारी, देवरबीजा, कोदवा, बारगांव और कठिया जैसे आसपास के ग्रामीण इलाकों में सुआ नृत्य की धूम देर शाम तक बनी हुई है। आधुनिकता के इस दौर में भी नई पीढ़ी की बालिकाओं द्वारा इस प्राचीन लोककला को बढ़-चढ़कर आगे बढ़ाना और दीपावली की रौनक में चार चांद लगाना विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। नृत्य के पश्चात ग्रामीण अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धापूर्वक नर्तक दलों को उपहार, अनाज और राशि भेंट किया। जिसके बदले नर्तक दल उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दी।

GAUTAM BEMTRA

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