सेब के वजन का बेर, छोटी सी गुठली, इतना गूदा, 2 में भर जाए पेट, बिहार के किसान का कमाल, शुगर पेशेंट्स के लिए सेफ!

रोहतास. रोहतास जिले के एक किसान ने पारंपरिक खेती की राह छोड़कर ऐसा प्रयोग किया है, जो अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है. तिलौथू प्रखंड के रहने वाले किसान दिनेश कुमार ने धान और गेहूं जैसी सामान्य फसलों को छोड़कर मीठे फलों की जैविक खेती पर ध्यान केंद्रित किया है. खास बात यह है कि उन्होंने पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीके से बेर की खेती को अपनाया और आज यह प्रयोग उनकी पहचान बन चुका है.
200 ग्राम का एक बेर
दिनेश कुमार ने अपने खेत में करीब 7 से 8 अलग-अलग किस्मों के बेर लगाए हैं, जो आकार, स्वाद और मिठास तीनों के मामले में सामान्य बेर से बिल्कुल अलग हैं. वे बताते हैं कि इन किस्मों के बेर न सिर्फ ज्यादा मीठे होते हैं, बल्कि उनका साइज भी काफी बड़ा होता है और देखने में बेहद आकर्षक लगते हैं. उनके खेत में तैयार होने वाले कई बेरों का वजन करीब 100 से 200 ग्राम तक पहुंच जाता है, जो आम तौर पर देखने को नहीं मिलता.
दिनेश कुमार का कहना है कि उनकी ओर से उगाए गए बेर पूरी तरह सुरक्षित हैं. इनमें किसी तरह का साइड इफेक्ट नहीं है. यहां तक कि शुगर के मरीज भी इन्हें खा सकते हैं और दो महीने का बच्चा भी इन बेरों का स्वाद ले सकता है. यही वजह है कि उनकी फसल को लेकर लोगों में भरोसा लगातार बढ़ रहा है.
850 पौधे लगे हैं खेत में
उन्होंने अपने खेत में कुल 850 बेर के पौधे लगाए हैं. खास बात यह है कि वे अपने बेर किसी बड़े बाजार में बेचने नहीं जाते. उनके अनुसार फसल खेत से ही हाथों-हाथ बिक जाती है. स्थानीय लोग सीधे उनके फार्म पर पहुंचते हैं और ताजे बेर खरीदकर ले जाते हैं. अब तो स्थिति यह है कि आसपास के लोग मिठाई भेजने के बजाय अपने रिश्तेदारों के घर दिनेश कुमार के फार्म से बेर भेजना ज्यादा पसंद करने लगे हैं.
ज्यादा गूदा, बीज छोटा
दिनेश कुमार ने अपने फार्म को इस तरह विकसित किया है कि लोग खुद खेत में जाकर पेड़ से बेर तोड़ सकते हैं, वहीं बैठकर खा सकते हैं और जरूरत के मुताबिक अपने घर भी ले जा सकते हैं. उनके बेरों में गूदा ज्यादा होता है, नसें कम होती हैं और खाते ही एक अलग ही मिठास का एहसास होता है, जो लोगों को बार-बार उनके फार्म तक खींच लाती है.
पारंपरिक खेती से अलग हटकर कुछ
अपनी इस अनोखी और सफल खेती के लिए दिनेश कुमार को पहले भी सम्मान मिल चुका है. उनका यह प्रयोग न सिर्फ उनकी आमदनी बढ़ा रहा है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी एक नई राह दिखा रहा है कि पारंपरिक खेती से हटकर भी खेती को फायदे का सौदा बनाया जा सकता है.




