पत्थर तोड़ना हो खेत में काम या जंगल से चारा लाना, मिलिए पहाड़ों को संभालती पहाड़ सी मजबूत महिलाओं से

पिथौरागढ़: पहाड़ों में महिलाएं सिर्फ़ घर की जिम्मेदारी नहीं संभालतीं, बल्कि पूरे परिवार और गांव की रीढ़ होती हैं. सुबह होने से पहले ही उनका दिन शुरू हो जाता है. खेतों में काम करना, पशुपालन, जंगल से चारा और लकड़ी लाना, दो पैसे कमाने की मेहनत और बच्चों की परवरिश ये सब कुछ अक्सर एक अकेली महिला के कंधों पर होता है. पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां इस जीवन को आसान नहीं बनातीं, लेकिन मजबूरी और हौसले के बीच ये महिलाएं हर दिन संघर्ष को अपना साथी बनाकर आगे बढ़ती हैं.
पहाड़ की असली रीढ़ है पहाड़ी महिलाएं
उत्तराखंड के कई पहाड़ी इलाकों में रोज़गार की तलाश में पुरुष शहरों की ओर चले गए, तो पीछे छूटे घरों की कमान महिलाओं ने थाम ली. कई महिलाएं पारंपरिक ज्ञान के सहारे खेती कर रही हैं, तो कई स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर स्वरोज़गार अपना रही हैं. वहीं कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिनके घर में न तो पति हैं और न ही बेटे, फिर भी वे अकेले ही मेहनत करके घर चला रही हैं.
जानिए चीना देवी की कहानी
ऐसी ही एक महिला हैं चीना देवी. उम्र ढलने के बावजूद उनकी दिनचर्या मेहनत से भरी है. चीना देवी बताती हैं, “इतनी उम्र हो गई है, फिर भी पेट पालने के लिए पत्थर तोड़ना पड़ता है. एक बेटा है, लेकिन वह काम की वजह से शहर में रहता है. अपने खर्च पूरे करने और घर चलाने के लिए यह काम करना ही पड़ता है.” उनकी आवाज़ में थकान के साथ-साथ आत्मसम्मान भी झलकता है. हालात चाहे जैसे हों, उन्होंने हार मानना नहीं सीखा.कुसुम देवी में सामने भी गंभीर चुनौती
वहीं कुसुम देवी की कहानी और भी कठिन है. उनके न तो पति हैं और न ही बेटा. घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी अकेले उन्हीं पर है. कुसुम देवी बताती हैं कि कैसे वे नदी से भारी पत्थर उठाकर लाती हैं और फिर उन्हें तोड़कर मजदूरी करती हैं. “कोई सहारा नहीं है, इसलिए खुद ही सब करना पड़ता है,” वे कहती हैं. पहाड़ की पथरीली ज़मीन पर उनका हर कदम संघर्ष की कहानी कहता है.कठिन भौगोलिक हालात, सीमित संसाधन और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद ये महिलाएं सिर्फ़ जी नहीं रहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की मजबूत मिसाल पेश कर रही हैं. उनका संघर्ष, श्रम और साहस ही आज पहाड़ों को थामे हुए है.




