कबीरधाम विशेष

पौष्टिक भी होता है और स्वादिष्ट भी। बोरे और बासी को खाने के वक्त उसमें लोग स्वादानुसार नमक का उपयोग करते हैं।

पौष्टिक भी होता है और स्वादिष्ट भी। बोरे और बासी को खाने के वक्त उसमें लोग स्वादानुसार नमक का उपयोग करते हैं।

प्याज, अचार और भाजी बढ़ा देते हैं स्वाद

बासी के साथ आमतौर पर प्याज खाने की परम्परा सी रही है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में प्याज को गोंदली के नाम से जाना जाता है। वहीं बोरे या बासी के साथ आम के अचार, भाजी जैसी सहायक चीजें बोरे और बासी के स्वाद को बढ़ा देते हैं। दरअसल गर्मी के दिनों में छत्तीसगढ़ में भाजी की बहुतायत होती है। इन भाजियों में प्रमुख रूप से चेंच भाजी, कांदा भाजी, पटवा भाजी, बोहार भाजी, लाखड़ी भाजी बहुतायत में उपजती है। इन भाजियों के साथ बासी का स्वाद दुगुना हो जाता है। इधर बोरे को दही में डूबाकर भी खाया जाता है। गांव-देहातों में मसूर की सब्जी के साथ बासी का सेवन करने की भी परंपरा है। कुछ लोग बोरे-बासी के साथ में बड़ी-बिजौरी भी स्वाद के लिए खाते हैं।
समाचार क्रमांक-500/निखलेश फोटो/ 06-18

कलेक्टर श्री जनमेजय महोबे ने जनचौपाल में ग्रामीणों की सुनी समस्या

कवर्धा, 01 मई 2023। कलेक्टर श्री जनमेजय महोबे ने जिला कार्यालय के सभाकक्ष में आयोजित जन चौपाल में जिले के नागरिकों से भेंटकर उनकी समस्याओं को गंभीरतापूर्वक सुनी। कलेक्टर ने एक-एककर जन चौपाल कार्यक्रम में पहुंचे आमजनों से उनकी समस्यों से संबंधित आवेदन प्राप्त किए एवं निराकरण के लिए आधिकारियों को निर्देशित किए। जन चौपाल कार्यक्रम में आज बोड़ला विकासखंड के ग्राम सिंघनपुरी निवासी वेदराम ने निर्माण कार्य की जांच कराने आवेदन दिया। कवर्धा निवासी श्री मधु पनागर ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन दिया। कलेक्टर ने तत्काल पशु चिकित्सा विभाग के उपसंचालक को दूरभाष से संपर्क कर त्वरित कार्यवाही करने के निर्देश दिए। इस अवसर पर संबंधित विभाग के अधिकारी उपस्थित थे।  ग्रामीणों ने कलेक्टर से मुलाकात कर राजस्व प्रकरणों के निराकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, पट्टा, नक्शा-खसरा, बंटवारा, नामांतरण, फौती आदि से संबंधित समस्याओं से अवगत कराया तथा त्वरित निराकरण की मांग की।
कलेक्टर श्री जनमेजय महोबे ने आज जन चौपाल में जिले के दूर-दराज से पहुंचे वनांचल, ग्रामीणों की समस्याओं और मांगों को गंभीरता पूर्वक सुनी और नियमानुसार त्वरित निराकरण के निर्देश संबंधित विभाग के अधिकारियों को दिए। कलेक्टर ने जनचौपाल में प्राप्त आवेदनों का समय-सीमा के भीतर निराकरण करने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया। सभी आवेदकों ने भी अपनी समस्या और मांगों से संबंधित आवेदन पत्र कलेक्टर को सौंपे। कलेक्टर श्री महोबे ने ग्रामीणों के विभिन्न समस्या एवं मांगों से संबंधित आवेदन को गंभीरता से लिया और नियमानुसार निराकरण की बात कहीं।

 

पोषक मूल्य भी प्रदान करता है।

बोरे और बासी बनाने की विधि

जहां बाकी व्यंजनों को बनाने के कई झंझट हैं, वहीं बोरे और बासी बनाने की विधि बहुत ही सरल है। न तो इसे सीखने की जरूरत है और न ही विशेष तैयारी की। खास बात यह है कि बासी बनाने के लिए विशेष सामग्री की भी जरूरत नहीं है। बोरे और बासी बनाने के लिए पका हुआ चावल (भात) और सादे पानी की जरूरत है। यहां बोरे और बासी इसलिए लिखा जा रहा है मूल रूप से दोनों की प्रकृति में अंतर है। बोरे से अर्थ, जहां तत्काल चुरे हुए भात (चावल) को पानी में डूबाकर खाना है। वहीं बासी एक पूरी रात या दिनभर भात (चावल) को पानी में डूबाकर रखा जाना होता है। कई लोग भात के पसिया (माड़) को भी भात और पानी के साथ मिलाने में इस्तेमाल करते हैं। यह पौष्टिक भी होता है और स्वादिष्ट भी। बोरे और बासी को खाने के वक्त उसमें लोग स्वादानुसार नमक का उपयोग करते हैं।

प्याज, अचार और भाजी बढ़ा देते हैं स्वाद

बासी के साथ आमतौर पर प्याज खाने की परम्परा सी रही है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में प्याज को गोंदली के नाम से जाना जाता है। वहीं बोरे या बासी के साथ आम के अचार, भाजी जैसी सहायक चीजें बोरे और बासी के स्वाद को बढ़ा देते हैं। दरअसल गर्मी के दिनों में छत्तीसगढ़ में भाजी की बहुतायत होती है। इन भाजियों में प्रमुख रूप से चेंच भाजी, कांदा भाजी, पटवा भाजी, बोहार भाजी, लाखड़ी भाजी बहुतायत में उपजती है। इन भाजियों के साथ बासी का स्वाद दुगुना हो जाता है। इधर बोरे को दही में डूबाकर भी खाया जाता है। गांव-देहातों में मसूर की सब्जी के साथ बासी का सेवन करने की भी परंपरा है। कुछ लोग बोरे-बासी के साथ में बड़ी-बिजौरी भी स्वाद के लिए खाते हैं।

Abhitab Namdeo

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